Monday, July 19, 2021

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य : छः साल में करीब दो गुना हुए मगरमच्छ।

 

सन् 1979 से, राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में जलीय जानवरों जैसे घड़ियाल (Gavialils gangeticus), लाल मुकुट कछुआ (Red crown tortoise), और विलुप्तप्राय गंगा सूं (Gangetic River Dolphin) का किया जा रहा है संरक्षण!



बाह (आगरा) वनविभाग की वार्षिक गणना के अनुसार, चंबल नदी में मगरमच्छ (Marsh crocodile) का कुनबा बढ़ रहा है। वनविभाग के मुताबिक 2016 में 454, 2017 में 562, 2018 में 613, 2019 में 706, 2020 में 710, 2021 में 886 मगरमच्छ (Indian crocodile) राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में मिले थे। अतः रिर्पोट के अनुसार, चंबल नदी (Chambal river) में मगरमच्छ (Crocodylus palustris) का कुनबा छः साल में दो गुना हो गया है।

481 नये बच्चे () मगरमच्छ परिवार में शामिल :

वनविभाग के अनुसार, चंबल नदी की बाह रेंज में, इस साल (अप्रेल-मई) में रिकार्ड हैचिंग हुई। मादा मगरमच्छों ने 12 स्थानों पर नेस्ट (nest) बनाये, जिनमें से 481 मगरमच्छ शिशओं का जन्म हुआ। पिछले वर्ष केवल 4 नेस्ट (nests) ही मिले थे, जिनसे 163 शिशुओं का जन्म हुआ था। नेस्टों (nest) में, अंड़ों को बाहरी और पानी के वन्यजीवों से बचाने के लिये ,विभाग ने लोहे की जाली लगा दी थी और जीपीएस से लोकेशन को बराबर ट्रेस किया गया।

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य :

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य (National Chambal Sanctuary) की स्थापना सन् 1979 में चंबल नदी पर मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के त्रिबिन्दु क्षेत्र में हुई, जो 5400 वर्ग किमी (2100 वर्ग मील) में फैला हुआ है। चंबल नदी में, इस अभयारण्य की कुल लंबाई 425 किलोमीटर है। इसे राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य (National Chambal Gharial wildlife Sanctuary) भी कहा जाता है। यह अभयारण्य भारत के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 (Wildlife Protection Act of 1972) के तहत संरक्षित क्षेत्र है। जिसकी स्थापना का मुख्य उद्देष्य विलुप्तप्राय घड़ियाल (Gavialils gangeticus), लाल मुकुट कछुआ (Red crown tortoise), जिसका वैज्ञानिक नाम-Batagur Kachuga, गंगा सूंस (Gangetic River Dolphin) की रक्षा करना है।

Friday, July 16, 2021

चंबल नदी : मगरमच्छ कुनवा बढ़ा : 481 नये और नन्हें बच्चे (hatchling) मगरमच्छ परिवार में शामिल!

एशिया की सबसे बड़ी घड़ियाल सेंचुरी में, इस साल हुई रिकार्ड हैचिंग (hatching), पिछले वर्ष जन्मे थे 163 मगरमच्छ शिशु।



बाह (आगरा) एशिया की सबसे बड़ी घड़ियाल सेंचुरी में, चंबल नदी ( chambal river) के बाह क्षेत्र में हुई रिकार्ड हैचिंग (hatching), जिसमें 481 नये नन्हें मगरमच्छ बच्चों (hatchling) ने जन्म लिया : जबकि पिछले वर्ष केवल 163 शिशुओं का ही जन्म हुआ था।

वनविभाग के अनुसार अप्रेल-मई में मगरमच्छ की नेस्टिंग (nesting) हुई थी। नेस्टों (nesting)में, अंड़ों को बाहरी और पानी के वन्यजीवों से बचाने के लिये ,विभाग ने जाली लगा दी थी और जीपीएस से लोकेशन को रग्यूलर ट्रेस किया गया।

Crocodile nesting (मादा मगरमच्छ अंड़ा देने से पूर्व गढ्डे खोदती हैं ) 

मगरमच्छ (crocodile) जिसका वैज्ञानिक नाम क्रोकोडायलस पैल्युसट्रिस (crocodylus palustris) है। जिनका साधारणतय प्रजनन काल मई से जून माह के बीच होता है। प्रजनन काल में मादा मगरमच्छ अंड़े देने से पूर्व नदी जलाशय के किनारे रेतीली जमीन पर छोटे-छोटे गढ्ड़े खोदती है। इसके बाद, कुछ दिनों के लिये उन गढ्ड़े को खुला छोड़ दिया जाता है। इस दौरान यदि गढ्डे के आसपास कोई खतरा नहीं होता, तो मादा मगरमच्छ उन गढ्डे में अण्डे देती है। मादा अंडों को मिट्टी या रेत के घोंसलों  में लगभग 3 से 5 फीट की गहराई में दबा देती है, और उनकी रात-दिन रखवाली करती हैं। मादा मगरमच्छ के अंड़े से जून और जुलाई माह में ही बच्चे निकलते हैं। जब बच्चे अंडे से निकलने वाले होते हैं, तो आवाज करते हैं। इस आवाज को सुनकर मादा मगरमच्छ घोंसलों (nesting) से मिट्टी हटाकर बच्चों को बाहर निकाल लेती है और अपने मुँह में दबाकर सीधा पानी ले जाती है। अंड़े से निकलने वाले बच्चों की अनुमानित लंबाई लगभग 6 इंच तक की होती है।   

चंबल नदी की बाह रेंज में मादा मगरमच्छों ने 12 स्थानों पर घोसलें बनाये, जिनमें से 481 मगरमच्छ शिशुओं का जन्म हुआ, पिछले वर्ष केवल 4 घोंसलों  (nest)ही  मिले थे, जिनसे 163 शिशुओं का जन्म हुआ था।

एक मादा मगरमच्छ, एक बार में 3 से 40 अंडे तक दे सकती है। लेकिन वाइल्ड ऐरिया में, मगरमच्छ के बच्चों के बाहरी और पानी के वन्यजीवों के हमले के कारण बचने के बहुत कम चांस होते हैं। ऐसा माना जाता है कि 99 फीसदी मगरमच्छ वयस्क होने से पहले ही मर जाते हैं या फिर किसी जानवर का शिकार हे जाते हैं। 

मगरमच्छों (marsh crocodile) की संख्या हुई दोगुनी 

वनविभाग की वार्षिक गणना के अनुसार, घड़ियाल सेंक्च्यूरी में, मगरमच्छ का वंश बढ़ रहा है। वार्षिक गणना के अनुसार : 2016 में 454, 2017 में 562, 2018 में 613, 2019 में 706, 2020 में 710, 2021 में 882 मगरमच्छ () चंबल नदी में मिले थे। आंकड़ों के अनुसार मगरमच्छ का कुनवा बढ़ रहा है, जो छः वर्षो में दो गुना हो गया है।

 

 

 

 

 

 

Tuesday, July 13, 2021

मानव-वन्यजीव संघर्ष पर डब्लूडब्लूएफ-यूएनईपी की साझा रिर्पोट : भारत के 35 प्रतिशत बाघ क्षेत्र, संरक्षित क्षेत्र से बाहर..

 

वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (wwfऔर संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (unep) ने हाल ही में जारी, " A future for all-the need for human-wildlife coexistence"के नाम से एक साझा रिर्पोट जारी की।

मुख्य बिन्दु :

रिर्पोट के अनुसार ,"मानव-वन्यजीव संघर्ष" दुनिया की अन्य प्रतिष्ठित प्रजातियों के दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए मुख्य खतरों में से एक हैं।

यह ध्रुवीय भालू, सील और हाथी जैसे विशालकाय शाकाहारी जीवों को भी प्रभावित करता है।

इस रिर्पोट के मुताबिक भारत के 35 प्रतिशत बाघ क्षेत्र, अफ्रीकी शरों के 40 प्रतिशत क्षेत्र, और अफ्रीकी एंव एशियाई हाथियों के 70 प्रतिशत क्षेत्र, संरक्षित क्षेत्र से बाहर हैं।

इस खूनी संघर्ष के कारण दुनिया की 75 प्रतिशत से ज्यादा जंगली बिल्लियों (wildcats) की प्रजातियां भी प्रभावित हैं।

इस संघर्ष के कारण ही 1970 के बाद वैष्विक वन्यजीव गणना में 68 फीसदी तक गिरावट आयी है।

भारतीय वन्यजीव परिदृश्य :

पर्यावरण, वन एंव जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने मानव-हाथी संघर्ष पर अपने ऑकड़े जारी किए हैं, जिसके अनुसार भारत में, 2014-2015 और 2018-2019 के बीच 500 से अधिक हाथियों की मौत हुई थी। इसी,मानव-हाथी खूनी संघर्ष में 2361 लोगों ने भी अपनी जान गवाई।

रिर्पोट के अनुसार समुद्री और स्थलीय संरक्षित क्षेत्र दुनिया में केवल 9.67 प्रतिषत क्षेत्र को कवर करते हैं, और इनमें से अधिकांश संरक्षित क्षेत्र एक दूसरे से अलग हो गए हैं।  इसलिये कई प्रजातियां अपने अस्तित्व के लिए मानव-बस्ती पर निर्भर करने लगी हैं।

निष्कर्ष :

मानव-वन्यजीव संघर्ष को पूरी तरह से समाप्त करना सम्भव नहीं है, लेकिन अच्छी योजनाओं को क्रियांवित कर, मानव-वन्यजीव संघर्ष के प्रभाव कम किया जा सकता है और एक आदर्श ढाचा प्रस्तुत कर मानव-वन्यजीव के बीच सह अस्तित्व को बढ़ावा देना चाहिये।